मन इस बात को लेकर बैचेन था कि ना जाने किस कालेज में मेरा दाखिला होगा । आखिरकार कालेज अलाटमेंट का दिन आ ही गया और मुझे माउंट आबू की कालेज में दाखिला मिला । इसी के चलते मुझे रिपोर्टिंग करवाने माउंट आबू जाना हुआ ।हालांकि मे कभी माउंट गया नही था लेकिन राजस्थान के इस एकमात्र हिल स्टेशन के बारें मेें बहुत कुछ सून रखा था । वह दिन भी आ गया जब मुझे माउंट आबू के लिए निकलना था । मैं सुबह 7 बजे की बस में सवार हो गया ।यह बस जालोर से आबूरोड के लिए प्रतिदिन सुबह 6 बजे निकलती है और 7 बजे सियाणा स्टेशन यानी की मेरे गांव पहुँचती है । तीन घंटे का सफर तय कर में आबूरोड स्टेशन पहुँचा ।माउंट आबू जाने वाले अधिकांश पर्यटक इसी स्थान से बस पकड़ते है । यह स्थान पर्यटन की दृष्टि से भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यहा रेलमार्ग की सुविधा भी है जो आबूरोड शहर को अन्य राज्यों से जोडता है । आबूरोड का सीधा संपर्क गुजरात राज्य से होता है और शायद यही कारण है कि माउंट आबू पर सर्वाधिक पर्यटक गुजरात से आते है ।
मानस पटल के द्वार पर कई प्रकार के सवाल दस्तक देने शुरू हो गए ।माउंट के लोग कैसे होंगे ? ऊंचाई पर जीवन कैसा होगा ? वहां का माहौल और रहन - सहन कैसा होगा तथा वहा की कोनसी जगह लोगों को सर्वाधिक प्रभावित करती होंगी आदि कई प्रकार के सवाल मन मस्तिष्क में विचरण कर रहे थे । एकाएक मेरा ध्यान माउंट आबू की ओर प्रस्थान करने वाली बस की ओर गया । मैं फटाक से बस में अपनी सीट के लिए दौड पडा क्योंकि यह माउंट आबू जाने का मेरा पहला अनुभव था और मै खिडकी की तरफ बैठ कर वहां के नजारों को निहारना चाहता था ।ऐसा लग रहा था जैसे ड्राइवर को हमसे भी ज्यादा उत्सुकता थी माउंट के लिए रवाना होने की ओर हो भी क्यों नही आखिर माउंट आबू तपस्या,त्याग,संस्कृति की भूमि है और यहां की ऊंची - ऊंची आसमान से बात करती हुई पहाडियों का मनोहर दृष्य हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करता है ।बस रवाना हुई और में खिडकी से बाहर के नजारों का आनंद लेने लगा । तलहटी से बस ढलान की ओर आगे बढने लगी । मंद-मंद हवा के साथ आने वाली प्राकृतिक खुशबू को मै महसूस कर रहा था ।बस धीमी गति से आगे बढ रही थी , जगह - जगह विकट मोड और सूचना बोर्डों पर चेतावनी साफ नजर आ रही थी । बस ड्राइवर पूरी निष्ठा के साथ अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा था । लेकिन प्राइवेट टैक्सी वाले आॅवरटैक कर के आगे की ओर तेजी से बढ रहे थे ,उनके लिए यह रोमांस की रफ्तार थी ।उनके लिए सूचना बोर्डों का कोई विशेष महत्त्व नही था । बरसात का मौसम था और मैंने महसूस किया कि जैसे ही बस ऊंचाई पर बढ रही थी वैसे ही ठंड का असर भी बढ रहा था । बस मे अधिकतम संख्या में नवदंपति ही नजर आ रहे थे जो एक - दूसरे के कंधो पर सिर रखकर सो रहे थे या फिर मस्ती करते नजर आ रहे थे । शायद हनीमून मनाने आए होंगे ताकि एक - दूसरे के साथ थोडा समय बिताते हुए इस पवित्रता के बंधन में कुछ यादगार पलों को यहां से समेटकर ले जाएंगे । अब बस सात घूम व्यूह पोइंट तक पहुँच गई थी और यह वह स्थान है जंहा से सात घुमावदार रास्ते देखने को मिलते है परंतु यहा बस रुकती नही है । थोडा ऊपर जाने पर रास्ते में छिपाबेरी पुलिस चौकी तथा आरणा हनुमानजी का मंदिर पडता है । हरे - भरे पेड और झाडियां यहा के प्राकृतिक सौंदर्य में वृद्धि करती है ।यकायक मेरा ध्यान पहाडी के ऊंची चोटी से आ रहे झरने पर पडी , यह झरना प्राकृतिक सौंदर्य में चार चांद लगा रहा था । वर्षा ऋतु में बहने वाले झरनें स्थानीय लोगों के साथ - साथ यहाँ आने वाले पर्यटकों का भी स्नान के लिए आह्वान करते है ।सदाबहार वनों के बारे मे मैने केवल किताबों मे ही पढा था किंतु उस दिन यहां साक्षात दर्शन भी हो गए । राजस्थान में सदाबहार वन केवल आबू पर्वत पर 32 किमी. क्षेत्र मे ही पाये जाते है । यही कारण है कि यहाँ की जलवायु आर्द्र है । अब मै माउंट आबू पर पहुँच चुका था । कालेज का पता किया तो पता चला कि जिस कालेज मे मेरा दाखिला हुआ है वो कुम्हार वाडा इलाके में पडती है ।यह इलाका बस स्टॉप से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर था ।चाय की दुकान पर चाय बनती देख मुझसे रहा नही गया ।मानो ऐसा प्रतीत हो रहा था कि चाय मुझे पुकार रही थी - आओ यशपाल तुम बहुत ही कांप रहे हो , बरसात के मौसम मे मुझे अपने सीने में जगह दो ताकि मैं तुम्हे कंपकंपाती ठंड से लडने की शक्ति दूँ ।
चाय के आग्रह को मैं ठुकरा न सका , मैंने गरमागरम चाय की प्याली ली और इस ठंड के मौसम मे गरमाहट का आनंद लेने लगा !![]() |
| माउंट आबू की एक थडी पर चाय का स्वाद |
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| सात घुम व्यू पोइंट,यहां से 7 सर्पिलाकार सडके दिखती है । |
फटाफट मैंने चाय के पैसे दुकान के मालिक को दिए और चल पडा कालेज को ढूंढने । ढलान वाले टेढे - मेढे रास्ते और ऊंची - ऊंची तीन - चार मंजिला इमारते माउंट आबू की उन्नति को दर्शाती है । यहाँ की सभी सडकें पक्की , मजबूत और टिकाऊ है । यही कारण है कि भारी वर्षा और यातायात के साधनों के अधिकाधिक आवागमन के बावजूद भी यहाँ की सडकें टूटने का नाम नही लेती । राजस्थान का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान माउंट आबू है लेकिन फिर भी यहाँ सडको पर पानी भरा हुआ नही रहता , बिमारी नही फैलती , वातावरण शांत एवं रमणीय है ।
अचानक ही मुझे ज्ञात हुआ कि मै गलत रास्ते पर जा रहा हूँ । सभी रास्तें एक समान दिखाई पडते थे । जैसे - तैसे करके मैंने राह चलते लोगों से पूछकर गंतव्य स्थान का पता किया । थोडा आगे जाकर मेरे कदम अनायास ही रुक गए ।मेरा ध्यान गार्डन के बाहर लगे उस बोर्ड पर गया जो डाॅ. राजेंद्र मुनि बी.एड.शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय , माउंट आबू की दिशा को दर्शा रहा था । यकायक मै खुशी से झूम उठा । हाँ ! यही तो मुझे रिपोर्टिंग करानी है । आखिरकार मैं अपनी मंजिल तक पहुँच ही गया ।मैंने एक नजर उस तीन मंजिला इमारत पर डाली और फिर भीतर प्रवेश किया ।लेकिन वहाँ मेरा सामना सर्वप्रथम एक कुत्ते से हुआ जो मुझ पर बरस पडा । कालेज के चैयरमेन को बीच बचाव करना पड़ा और फिर बाद में ज्ञात हुआ कि उस कुत्ते का नाम बैंजो था जो कि कालेज चैयरमेन का ही पालतु कुत्ता था ।
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| बी.एड.कालेज के प्रशिक्षणार्थी ,कालेज का बाहरी उद्यान....☺ |
मैं संबंधित दस्तावेज कालेज में जमा करने के पश्चात जैसे ही बाहर निकला तो मेरी नजर एक ऐसे लडके पर पडी जिसकी धुंधली सी तस्वीर मेरे स्मर्ति पटल पर अंकित होने लगी । आखिर मैने इसे कहा देखा था ? वो करीब आया तो नजरें चार हुयी ।शायद वो इसी कालेज मे आये थे और मुझसे आवश्यक दस्तावेजों के बारे में जानकारी चाहते थे ।इसी बहाने मुलाकात हुई तो पता चला कि उनका नाम अरविंद सिंह है और हम दोनों ने एक ही जगह से स्नातक किया है ।मानस पटल की धुंधलाहट तो पूर्ण रूप से हट गई थी लेकिन अब बादल नीचे आ जाने से वातावरण में धुंधलापन छा गया था । पहली ही मुलाकात में हुई हमारी दोस्तीं जय और वीरू की दोस्ती से कम नही थी । अब हल्की सी बारिश भी शुरू हो गई थी और मुझे ध्यान आया कि अब मुझे किराये पर मकान भी देखना चाहिए ।अरविंद ने कहा कि मेरे रिश्तेदार यहाँ रहते है तो कुछ दिन वहां रहते हुए कोई अच्छा सा मकान ढूँढ लेंगे ।मैने भी उनकी सलाह को मानना ही उचित समझा क्योंकि आनन - फानन में कोई अच्छा मकान मिलना लगभग असंभव सा नजर आ रहा था ।यहां अच्छा मकान मिलना मुश्किल हो जाता है क्योंकि यह हिल स्टेशन है और यहाँ के मकान मालिक आने वाले पर्यटकों के लिए अपने मकानों को गेस्ट हाउस के रुप में प्रयोग करते है । पर्यटक एक - दो दिन रुकते है और हजार या पंद्रह सौ रुपए देके जाते है । आखिरकार हमने भी एक अच्छा दो कमरे वाला मकान किराए पर ले लिया । मैंने महसूस किया कि हमारे मकान से कालेज काफी दूर थी लेकिन हम दोनो ने कभी भी छुट्टी नही रखी ।हम दोनो के स्वतंत्र विचार थे ,हमने कभी भी अपने विचार एक - दूसरे पर नही थोंपे । कालेज में हमारे बहुत सारे दोस्त बने ।कालेज के ही एक साथी जगदीश ने सुझाया कि क्यों ना इस रविवार को माउंट आबू की यात्रा की जाए ।आखिर हम सभी मित्रों ने, जिसमें मै , अरविंद सिंह, हनुमान जाखङ , पुरण सिंह , कमलेश बिश्नोई , रुपाराम ,अरविंद कुमार थे ; ने जगदीश के इस विचार को स्वीकृति प्रदान की ।
रविवार का दिन आ गया और हम सब सुबह 10 बजे देलवाडा मंदिर के दर्शन के लिए चल पडे ।देलवाडा मंदिर की प्रमुख खायत यह है कि इसे विश्व विरासत में शामिल किया गया है ।ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण गुजरात के शासक भीमदेव के सेनापति विमलशाह ने करवाया था । मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से अनूठा है । मंदिर की मुख्य मूर्ति आदिनाथजी की है । हमारी यह प्रबल इच्छा थी कि इस मंदिर के प्रांगण में फोटो खींचे और यहा की संस्कृति,सभ्यता,कलाकृति को हमेशा के लिए कैमरे मे कैद कर ले किन्तु यहाँ फोटो खीचने पर जुर्माना है ।मंदिर के बाहर ही मोबाइल जमा कराने की व्यवस्था ट्रस्ट द्वारा की गई है । मंदिर के बाहर तरह - तरह की दुकाने सजी हुई है । इन सभी दूकानों में से हीरा भाई की होटल आबू की सर्वाधिक प्रसिद्ध दूकान है । इसी होटल में आबू की सुप्रसिद्ध चाय मिलती है । जिस प्रकार चुंबक लोहे को अपनी ओर आकर्षित करता है ठीक उसी तरह हीरा भाई होटल पर बनने वाली चाय पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है ।हीरा भाई बडे प्यार से चाय पिलाया करते है ।![]() |
| अचलगढ़ दुर्ग के पास स्थित सावन भादो झील |
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| राजस्थान का सर्वोच्च स्थान गुरुशिखर |
कहा जाता है कि अचलगढ़ के किले का निर्माण परमार राजपूतों ने करवाया था किंतु बाद में इस किले पर आधुनिकीकरण राणा कुंभा ने करवाया था । इस किले के ऊपर से पहाडी का विहंगम दृश्य देखने का अलग ही आनंद है । यहा के कुछ भवन जो अब खंडहर हो गए थे ; हमे उस काल की विकसित संस्कृति से अवगत कराते है ।यहा से भी हमे गुरुशिखर के लिए निकलना था । हम सभी मित्र यायावरी प्रवृत्ति के थे अतः हमारे कदम थकने का नाम ही नही ले रहे थे ।
हमने गुरुशिखर पहुंचकर 3 बजे जलपान किया । यहां आकर हम गौरवान्वित महसूस कर रहे थे ,ऐसा लग रहा था कि हमने कोई किला फतह किया हो ।हम राजस्थान के सर्वोच्च स्थान पर आसीन हो गये थे । यह स्थान समुद्रतल से 1722 मीटर की ऊँचाई पर है ।संतो के शिखर के नाम से मशहूर इस स्थान ने मेरे भीतर के आध्यात्म को जगा दिया । फिर हमने नक्की झील को देखने का मानस बनाया यहा लोग नाव मे बैठकर आनंदमय वातावरण का लुत्फ ले रहे थे ।यहा का नजारा पूर्ण रूप से भिन्न था , यहा का वातावरण युवा वर्ग के लिए विशेष मायने रखता है । कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को लेकर पार्क में बैठा है ,तो कोई नई शादीशुदा जोडी एक - दूसरे का हाथ थामकर नक्की झील की चांदनी सी रात में इधर - उधर टहल रही होती है । इस स्थान पर बुजुर्गो का आना धीरे - धीरे बहुत ही कम हो गया है । शायद नई युवा पीढी के इस व्यवहार को देखकर उनका मन इस स्थल पर आने का नही करता होगा ।यही कुछ कारण रहे होंगे कि वे इन बच्चों के साथ सामंजस्य स्थापित नही कर पाते है ।खैर कारण जो भी रहा हो परंतु एक बात को नही नकारा जा सकता कि बुढापे मे ध्यान और भक्तिभाव मे जरूर मन लगता है इसलिये बुजुर्गो को मंदिर के दर्शन करने जैसी शांति कही नही मिलती । चांदनी रात और नक्की के चारौ ओर की लाइट्स के प्रकाश से नक्की झील का सौंदर्य देखते ही बनता था । इस नक्की को देखकर इसके निर्माण से जुडी एक किवदंती स्मरण हो आई कि किस तरह से रसिया बालम ने एक ही रात में इस नक्की झील को नाखून के सहारे खोदा होगा । भले ही आज के समय मे इस प्रकार की किवदंती पर भरोसा करना मुर्खता का पर्याय हो किंतु राजस्थान ओर विशेषकर आबू की जनता के लिए यह किवदंती बहुत ही मायने रखती है । आखिरकार उनकी भावनाओं से जुडा हुआ विषय जो है ।
अचानक ही बारिश की हल्की-हल्की बूँदे गिरने लगी ।पूरण सिंह ने सलाह दी कि अब हमे अपने-अपने मकान की ओर चलना चाहिए । यहां की बारिश का कोई ज्यादा भरोसा नही है, किसी भी समय विकराल रूप धारण कर लेती है ।रात को 8 बजे हम सभी अपने - अपने निवास की तरफ चल पडें तथा अगले रविवार का इंतजार करने लगे ।
6 दिन तक लगातार कालेज आना -जाना रहा । इन 6 दिनों के भीतर हमने कालेज में सभी मित्रों ने मिलकर एक कमेटी गठित की जिसका प्रमुख उद्देश्य कालेज से प्रत्येक शनिवार को दोपहर के भोजन के बाद माउंट आबू के किसी सुंदर स्थान पर भ्रमण पर जाने हेतु प्रिंसिपल मैम से आग्रह करना था । इस विचार पर सभी मित्र एकमत थे और इसी को मद्देनजर रखकर प्राचार्या डॉ. सुनीता डूडी ने शिक्षकों का एक सम्मेलन आयोजित किया । इस सम्मेलन पर मुझे पुरा संदेह था कि आज फैसला हमारे विपक्ष मे ही आएगा लेकिन हनुमान तत्काल ही प्राचार्या के आफिस से बाहर आया और कहना लगा कि अगले शनिवार से कार्यक्रम को हरी झंडी दिखा दी जाएगी । मुझे विश्वास नही हो रहा था कि कैसे सब टीचर्स मान गए ? आज से पहले तो ऐसा कभी नही हुआ था , शायद सुनंदा मैम ने कहा होगा की बच्चों की भावनाओं का मान रखना चाहिए या फिर कलावती मैम ने कहा होगा कि पढाई के साथ शैक्षिक भ्रमण का विशेष महत्व है । यह भी तो हो सकता है कि सभी शिक्षक भ्रमण पर जाना चाहते हो ।खैर छोडिए इन बातों को इनसे आपका क्या प्रायोजन ।
अगला दिन रविवार था और तोरणा गांव ( माउंट आबू की एक जगह का नाम ) से कमलेश का फोन आया तो उसने हमे भोजन हेतु आमंत्रित भी किया और साथ ही जल्दी से उनके मकान पर आने की हिदायत दी । मै और अरविंद सिंह गोवा गांव से तोरणा के लिए निकल पडे ।कमलेश के यहाँ भोजन करने के पश्चात हम गोमुख के दर्शन के लिए रवाना हुए ।गौरतलब है कि गोमुख माउंट से लगभग 4 किमी. दूर है और इस स्थान तक जाने के लिए आपके अंदर आस्था का होना जरूरी है अन्यथा कोरा आडम्बर आपको इस स्थान पर जाने की शक्ति नही देगा । चार किलोमीटर की दूरी आपको पैदल ही तय करनी होती है । यहां से घने जंगल का दृश्य बहुत लुभावना और डरावना है ।गोमुख तक जाने के लिए पर्वत को काटकर टेढ़ी - मेढ़ी चिढ़ीया बनाई गई है जो कभी ऊँचाई पर जाने लगती है तो कभी यात्री को अपने साथ नीचे ढलान की ओर ले जाती है ।पुरी दुनिया से लडने की बात करने वालों की इस स्थान की यात्रा के दौरान सांस फूलने लगती है । मै भी काफी तक चुका था । हम सभी चिढ़ीयों पर ही बैठ गए ।बहुतायत मे इस घने जंगल मे आम के पेड दिखाई दे रहे थे पर अफसोस की आम पककर गिर गए थे और अब वहां इक्का - दूक्का गुठली ही नजर आ रही थी ।हमने आगे पीछे देखा तो दूर - दूर तक रास्ता सुनसान था ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो सबकी आस्था और विश्वास ने जवाब दे दिया था ।हमने वापस यात्रा आरंभ की और मेरे भीतर एक सवाल उत्पन्न हो आया कि यदी आज मेरी जगह सुमित्रानंदन पंत होते तो इस प्रकृति का कितना सुंदर वर्णन करते । आखिर वे प्रकृति के चितेरे कवि और प्रकृति प्रेमी माने जाते है । प्रकृति ने भी शायद उनको अपना सच्चा साथी माना होगा ।यह हर किसी को अपनी तरफ आकर्षित नही करती क्योंकि प्रकृति का प्रेम अनूठा है । प्रकृति से जुडने हेतु आपका साहित्य से जुडाव नितांत आवश्यक है ।पंतजी साहित्य से जुडे हुए थे और उनका काव्य संग्रह उन्हे एक अलग पहचान दिलाने में अहम भूमिका का निर्वाह करता है । प्रकृति को जिस प्रकार की उपमा पंतजी ने दी है ऐसी उपमा और किसी ने नही दी ।इस क्षेत्र मे पंतजी का कोई सानी नही है ।
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| मेंढ़क आकार की चट्टान |
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| टाॅड राॅक से नक्की झील का दृश्य |
अब कुछ बंदर दिखाई पडे जिससे अनुमान लगाया गया कि अब मंदिर आसपास ही होगा । मात्र 10 मिनट के पश्चात ही हम मंदिर प्रांगण में पहुँच गए और हमारी दृष्टि गोमुख की ओर गई जिसके मुख से एक जलधारा प्रवाहित होकर जलाशय मे गिर रही थी । यहाँ पास ही एक कुण्ड बना हुआ है जिसके बारे मे दंतकथाओं के अनुसार यह मान्यता है कि एक बार परशुराम ने क्रोधित होकर इस पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर दिया था । ऐसी दशा मे राजा न होने के कारण प्रजा हाहाकार करने लगी और राज्य मे अराजकता फैलने लगी । इस संकट से उबरने के लिए ऋषि वशिष्ठ ने देवताओं के आशीर्वाद से एक यज्ञ किया जिसके फलस्वरूप इसी अग्निकुंड से प्रतिहार,परमार, चालुक्य तथा चौहान वंश की उत्पत्ति हुई ।इस किवदंती की पुष्टि चन्दबरदाई द्वारा रचित "पृथ्वीराज रासौ " महाकाव्य से भी होती है ।हमने भी इस कुण्ड की राख का टीका अपने मस्तक पर लगाया और उस मंदिर की परिक्रमा करने लगे ।यहा राम मंदिर भी है और साथ ही रात्रि विश्राम एवं भोजन की व्यवस्था भी है । आज हम वाकई बहुत ही थक चुके थे और हम सबको वापसी की जल्दी भी थी क्योंकि शाम के चार बज रहे थे और ज्यादा अंधेरा होने पर घर की तरफ रवाना होना खतरे से खाली नही था ।वहा कोई चोरी का भय नही है ।भय था तो सिर्फ जंगली जानवरो का और विशेषकर भालू का ।यहाँ के भालूओं का आतंक सर्वविदित है क्योंकि यहाँ के भालूओं का हमला जानलेवा होता है ।बस इसी डर से हमारा ग्रुप जल्दी ही माउंट आ पहुँचा ।
अब हम सब मित्रों ने चाय पीने का निश्चय किया और चल दिए अपनी पसंदीदा चाय की दुकान पर । यहाँ हम अक्सर मार्केट आते समय चाय पीया करते थें । यहा की चाय का स्वाद हमे बहुत ही प्रभावित करता था और चायवाला भी हमे अच्छी तरह पहचानने लगा था । इसलिये वह पर्यटकों को दस रुपए प्रति कप की लागत वाली चाय हमे पांच रुपये में ही बेचता था ।उसका नाम सुरेश था और हमेशा ही उसके मुँह पर एक स्वछंद हसी बिखरी रहती थी ।यहा से हम टाॅड राॅक देखने के लिए निकले ।नक्की के किनारे से ही टाॅड राॅक जाने की चिढियां मिलती है ।किनारे चलते - चलते हम चिढियों तक पहुँचे और लगभग 50 चिढियां चढ़ने के पश्चात हमे एक चंपा नामक गुफा दिखी । हनुमान मंदिर के पास टाॅड राॅक मार्ग पर स्थित यह गुफा इसलिये प्रसिद्ध है क्योंकि प्राचीन समय में स्वामी विवेकानंद ने यहा कुछ समय व्यतीत किया था ।आध्यात्मिक जगत से इस जगह का जुडाव है ।यहां से आगे बढ़ते हुए हमारी मित्र मंडली अंत मे टाॅड राॅक पहुँची । यहाँ मेंढक का आकार लिए एक विशाल चट्टान को देखने के लिए लोग दूर से आते है ।इस मेंढक रुपी चट्टान का मुँह नक्की झील की तरफ है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि यह मेंढक निक्की झील के सौंदर्य को निहार रहा हो ।
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| Sunset View Point,Mount abu |
यहा से हम सभी वापस नक्की झील ,तिब्बती मार्केट होते हुए सूर्यास्त देखने के लिए सनसेट पोइंट हेतु चल दिए ।हमे इस बात की चिंता थी कि कई हमारे वहा पहुंचने से पूर्व ही सूर्य अस्त न हो जाए । हमने कदमों की गति मे परिवर्तन किया । यहा पर घोडे पर बैठ कर सनसेट तक जाने की व्यवस्था भी थी लेकिन हम लोगो ने पैदल चलना ही उचित समझा ।कुछ युगल एक ही घोडे पर साथ बैठे हुए थे । कुछ समय पश्चात हम सनसेट पहुँच गए और अस्त होते हुए सूर्य को देखने का आनंद ले रहे थे । दूर - दूर तक फैला हुआ जीवन हम ऊपर से देख रहे थे । नीचे पानी का विस्तार देख कर हम अनुमान लगा रहे थे कि शायद यह फला गांव का तालाब है । देखते ही देखते आकाश केसरिया रंग मे रंग गया और सूर्य आसमान मे ही विलीन हो गया ।इस प्रकार सूर्य को हमारी आँखो के सामने से ओझल होते देख हमे आनंद आया । अब सभी लोग अपने-अपने निवास की तरफ अग्रसर होने लगे ।अब हम भी अपने निवास की ओर पलायन करने लगे । एक बार पुनः अपनी पसंदीदा होटल पर चाय पी और घर आकर खाना खाकर सो गए ।
अगले शनिवार से हमने कालेज की ओर से पिकनिक मनाने के दौरान अर्बुदा माता मंदिर,वीर बावसी मंदिर,अरण्य विलेज,ट्रैवल्स टैंक, बुद्ध विहार, पिस पार्क, ज्ञानसरोवर,पांडव भवन, अंध विद्यालय, रसिया बालम एवं कुवारी कन्या मंदिर, अग्नेशर महादेव मंदिर आदि कई दर्शनीय स्थलों का हमने भ्रमण किया ।
आज भी मुझे माउंट आबू की भूमि पर बिताए गए वो हसीन पल याद आते है तो जीवन मे मधुरता का संचार होने लगता है ।माउंट आबू मे एक अजीब सी आकर्षण शक्ति है जो पर्यटकों को आकर्षित करती रहती है । ऐसी मान्यता है कि इस शहर की रक्षा स्वयं हनुमानजी करते है और शायद यही वजह है कि आबू पर्वत पर सर्वाधिक ( लगभग 12 ) मंदिर हनुमानजी के ही है ।रामभक्त हनुमान जैसा रक्षक जिसके पास हो उसके पास भला कोई कमी हो सकती है क्या ?
आप भी अपनी जिदंगी मे यात्रा करने के शौकीन है तो आइए राजस्थान का शिमला उपनाम से प्रसिद्ध माउंट आबू आपका हार्दिक स्वागत करता है ।
यशपाल सिंह चौहान
गांव- सियाणा (जालोर)
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| बी.एड.की शिक्षा के अंतिम वर्ष में खिंची गई तस्वीर । |











वाह हुक्म शानदार संस्मरण
जवाब देंहटाएंआभार हुकुम....🙏
हटाएं👌👌👌👌👌✍️उत्कृष्ट लेखन कौशल
जवाब देंहटाएंआभार....☺
हटाएंअतीउत्ताम संस्मरण लेखन👌
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार श्रीमान !
हटाएंयात्रा वृतान्त सुन्दर भाषा शैली अत्युत्तम ।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार श्रीमान...!!
हटाएंशानदार संस्मरण।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार हुकुम...!
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